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प्रो. सत्यदेव निगमालंकार के प्रमाणपत्रों में फर्जीवाडा स्पष्ट है : ब्रह्मचारी दयानदं

-प्रो. सत्यदेव निगमालंकार के फर्जी प्रमाणपत्र होने के कारण नियुक्ति की अवैध
आपकी आवाज़, संवाददाता
हरिद्वार। मातृसदन के ब्रह्मचारी दयानदं ने प्रेस को जारी बयान में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के श्रद्धानन्द वैदिक शोधसंस्थान के अध्यक्ष प्रो. सत्यदेव निगमालंकार के फर्जी प्रमाणपत्र होने के कारण उनकी नियुक्ति को अवैध बताया है। उन्होंने कहाकि फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड करते हुए भारत सरकार से प्रतिमाह लाखों रुपये ले रहे हैं। इनके फर्जी प्रमाण पत्रों को लेकर भारत सरकार के पास आयी शिकायतों के आधार पर अनेकबार यूजीसी ने जांच करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखा, परन्तु विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस विषय पर कोई स्पष्ट एवं समुचित कार्यवाही नहीं की है। प्रो. सत्यदेव निगमालंकार के प्रमाणपत्रों में फर्जीवाडा स्पष्ट है, क्योंकि इन्होंने आवेदित बायोडाटा में प्रथमा 1977, मध्यमा 1979 व शास्त्री 1982 में प्रदर्शित की है, जबकि प्रमाण-पत्रों के अनुसार श्रीमद् दयानन्द आर्ष विद्यापीठ, झज्जर, हरियाणा से प्रथमा (कक्षा आठवीं) सन् 1976 में, मध्यमा (कक्षा 9वीं,10वीं,11 वीं) 1979 में तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से द्विवर्षीय शास्त्री (बीए) सन् 1982 में उत्तीर्ण की है। यहॉ जॉच का विषय यह है कि उत्तरप्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के अनुसार शास्त्री उपाधि हेतु इण्टर अथवा समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है। परन्तु प्रो. सत्यदेव के बायोडाटा के अनुसार इन्होंने इण्टर नहीं किया है, जिसके कारण इनकी शास्त्री (बीए) से आगे की सभी उपाधियॉ स्वतः ही अवैध हो जाती है। उन्होंने कहाकि विचारणीय है कि इनके मध्यमा (कक्षा 9,10,11) के अंक पत्र में जन्मतिथि का कोई उल्लेख नहीं है। पुनः विश्वविद्यालय ने उनकी जन्मतिथि किस प्रमाणित दस्तावेज के आधार पर स्वीकार की है। श्रीमद् दयानन्द आर्ष विद्यापीठ, झज्जर, हरियाणा की त्रिवर्षीय मध्यमा (कक्षा 9वीं,10वीं,11 वीं) को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी द्विवर्षीय शास्त्री (बी.ए.) हेतु मान्य नहीं करता था। अतः इस आधार पर प्रो. सत्यदेव ने दो वर्ष की शास्त्री (बी.ए.) की उपाधि किस प्रकार से प्राप्त की?  ब्रह्मचारी दयानंद ने कहाकि इससे भी बड़ा फर्जीवाडा यह है कि इन्होंने वेदामऊ वैदिक विद्यापीठ, बदायूं (उत्तर प्रदेश) से सन् 1980 में द्विवर्षीय उत्तर माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण की है। जिसकी मान्यता किसी भी अधिकृत शिक्षण संस्थानों से नहीं थी। इस उत्तरमाध्यमिक परीक्षा, उपाधि के प्रमाण-पत्र के आधार पर ही इन्होंने आगे की उपाधियां प्राप्त की है। वेदामऊ वैदिक विद्यापीठ, बदायूं के फर्जी प्रमाण पत्रों के बारे में समय-समय पर अनेक समाचार पत्रों भी समाचार प्रकाशित होता रहा है। प्रो. सत्यदेव निगमालंकार ने इस वेदामऊ वैदिक विद्यापीठ, बदायूं की माध्यमिक कक्षा के अंकपत्र, प्रमाणपत्र को कहीं पर भी प्रदर्शित नहीं किया है, हर जगह छिपाया है। इन्होंने मध्यमा एवं शास्त्री के बीच में केवल एक साल में द्विवर्षीय माध्यमिक परीक्षा कैसे उत्तीर्ण कर ली है ? उन्होंने कि प्रो. सत्यदेव निगमालंकार ने अपने शैक्षिक प्रमाणपत्रों में जालसाजी कर विविध प्रतिष्ठित संस्थानों में नौकरी प्राप्त की है। जिसके आधार पर अब तक करोड़ंो रुपये सरकार के प्राप्त कर लिये हैं। इनके इस घोर आपराधिक कृत्य के लिये इनकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय प्रशासन, यूजीसी व भारत सरकार को ऐसे शैक्षिक प्रमाणपत्रों में जालसाजी करने वाले प्रो. सत्यदेव निगमालंकार जैसे व्यक्ति पर तुरन्त न्यायिक कार्यवाही करनी चाहिए।

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